Friday, August 22, 2008
यादें, दिल और दिमाग में ताज़ा यादें
शायद कुछ साल बाद मेरे बेटे को अपने बचपन की याद सिर्फ 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती रेलगाड़ियों (पता है पापा को शताब्दी से ग्वालियर पहुंचने में साढ़े तीन घंटे लगते थे), धीमे ब्रॉडबैंड, पांच-छह बार कोशिश से लगने वाले मोबाइल, टाटा की मार्कोपोलो बसों और सिर्फ 40 मंजिल के अपार्टमेंट्स जैसी बातों से रहेगी। वो तो कल याद करेगा हम तो आज करते हैं, दीपावली से महीना भर पहले से बांसिया पेपर से बनने वाले कंदील, गर्मियों भर उड़ने वाली पतंगें और जहां-तहां नज़र आने वाली रंगीन तितलियां। आपको भी तो कुछ याद होगा वो लंगड़ी का खेल, अष्टा-चंगा, कंचे, तांगे की सवारी, छोटे से सिनेमाघर में सिर्फ दो या तीन शो और वो कागज़ की कश्ती ओ बारिश का पानी....और भी ना जाने क्या-क्या। इस ब्लॉग के ज़रिये आप अपनी कहिये, दूसरों को सुनाइये और दूसरों की सुनिये। पहल कर रहा हूं, यादों के इस सांझा चूल्हे को बुझने ना दें।
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क्या दिन थे वो,
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भूले ना भूलें,
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